BREAKING NEWS: गाँधी परिवार 37 साल बाद हुआ एकजुट , लड़ेंगे यहाँ से चुनाव, ये होंगे मुख्यमंत्री उम्मीदवार

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वरुण गांधी कांग्रेस में शामिल होने वाले हैं. वरुण गांधी के रिश्ते अपनी बहन प्रियंका गांधी से शुरू से ही बेहतर हैं. वक़्त के साथ बड़े भाई राहुल गांधी और बड़ी मां सोनिया गांधी से भी बेहतर हुए. या यूं कहें वरुण गांधी जिस रफ्तार से बीजेपी से दूर होते गए उसी रफ्तार से नेहरू गांधी परिवार के करीब होते गए. सिर्फ एक अड़चन थी. जेठानी सोनिया गांधी और देवरानी मेनका गांधी के रिश्ते इस रफ्तार से नही सुधर रहे थे. बेटे के राजनीतिक भविष्य के लिए मेनका गांधी ने भी इस रिश्ते के लिए अब हामी भर दी है.

सूत्रों के अनुसार राहुल गांधी के कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही वरुण गांधी को भी पार्टी में एक सम्मानजनक पद मिल सकता है. ऐसे में 37 साल बाद नेहरू गांधी परिवार एक हो सकता है. ऐसा आखिर कैसे होने जा रहा है, इस समझने के लिए यह जानना भी जरूरी है. नेहरू-गांधी ख़ानदान के वरुण गांधी क्या महज एक सांसद रह कर ही संतोष कर लेंगे ? क्या उनका भविष्य अब अमित शाह और नरेंद्र मोदी की बीजेपी में नहीं है ? क्या बीजेपी वरुण गांधी से डरती है ? यह सारे सवाल समर्थकों के साथ साथ पिछले कई सालों से वरुण गांधी को भी परेशान किये हुए है.

कांग्रेस मुक्त भारत की सोच रखने वाली पार्टी में वरुण गांधी का भविष्य काफी धुंधला है. इस बात को वरुण गांधी भी अब बखूबी समझने लगे हैं. आजकल वरुण गांधी जो अख़बारों में कॉलम लिखते हैं उनमें सामाजिक न्याय और सहभागिता की बात करते हैं. उन्हें यह भी पता है कि बीजेपी के शासन में यह होने से रहा. वरुण गांधी को अमित शाह, राजनाथ सिंह का आदमी समझते हैं. बीजेपी का जो वर्तमान नेतृत्व है, उसमें वरुण गांधी का भविष्य न के बराबर है. दरअसल, इलाहाबाद में जून’16 में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी तब वरुण गांधी के समर्थकों ने अपनी ताकत दिखाई थी, लेकिन यह नरेंद्र मोदी और अमित शाह को पसंद नहीं आया था.

सच तो यह है कि वरुण गांधी की संघ की पृष्ठभूमि नहीं है. वह स्वतंत्र रूप से सोचने वाले व्यक्ति हैं. खासकर उत्तर प्रदेश में वरुण गांधी संभावनाओं से भरे नेता हैं. उनकी स्वीकारोक्ति प्रदेश की सभी जातियों में संभव है. वह बीजेपी की तरफ से एक मजबूत नेता के रूप में उभर सकते थे, लेकिन शाह और मोदी की बीजेपी को वरुण गांधी पसंद नही हैं. वरुण गांधी, नेहरू-गांधी परिवार से हैं और उनकी महत्वाकांक्षा केवल सांसद तक ही सीमित नहीं है. राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में अब इसी का भरपूर लाभ उठाना चाहते हैं.

करीब 9 साल पहले 9 मार्च’09 को उत्तर प्रदेश के पीलीभीत के बरखेरा गांव में 29 साल के वरुण गांधी एक रैली को संबोधित करते हुए बीजेपी नेता के रूप में एक विवादास्पद बयान देकर सुर्खियों में आए थे. इस बयान के बाद लगा कि भारतीय जनता पार्टी को वरुण गांधी के रूप में युवा चेहरा मिल गया. वही वरुण गांधी इन दिनों अपनी ही पार्टी बीजेपी में हाशिए पर हैं. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इन्हें राज्य में प्रवेश करने पर पार्टी ने रोक लगा दी थी. दरअसल, जब तक बीजेपी की कमान राजनाथ सिंह के पास रही तब तक वरुण गांधी की पार्टी में सम्मानजनक हैसियत रही. वे पार्टी महासचिव रहे, पश्चिम बंगाल में प्रभारी भी रहे.

बीजेपी में जब नरेंद्र मोदी को पीएम प्रत्याशी बनाने के लिए उठापटक जारी थी तब वरुण गांधी ने राजनाथ सिंह की तुलना अटल बिहारी वाजपेयी से करते हुए पीएम उम्मीदवार बनाने की वक़ालत की थी. वरुण गांधी ने 1 मई’13 को कहा था कि वाजपेयी की सोच बहुत अच्छी थी. उनका शासनकाल देश के हर बच्चे को याद है. मैं पूरे भरोसे के साथ कह सकता हूं कि आज की तारीख़ में देश में कोई व्यक्ति जाति और मजहब की दीवार तोड़कर लोगों को साथ ला सकता है तो वह आदरणीय राजनाथ सिंह हैं. मजे की बात तो यह है कि यह बात वरुण गांधी ने राजनाथ सिंह की मौजूदगी में बरेली के पास एक जनसभा में कही थी. बीजेपी की कमान जब अमित शाह के हाथ में आई तो उन्होंने वरुण गांधी को पार्टी महासचिव से हटा दिया. उनसे बंगाल की भी जिम्मेदारी वापस ले ली गई.

कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में 6 फरवरी’14 को नरेंद्र मोदी ने रैली की थी. नरेंद्र मोदी की रैली के बाद इस बात की चर्चा हो रही थी कि भारी संख्या में लोग मोदी को सुनने पहुंचे थे. लेकिन उस वक्त वरुण गांधी ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि मीडिया के पास गलत आंकड़ा है. यह सच नहीं है कि रैली में दो लाख से ज़्यादा लोग आए थे. रैली में 45 से 50 हज़ार के बीच लोग आए थे. चुनाव के बाद राजनाथ सिंह गृह मंत्री बने और अमित शाह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष. अगस्त’14 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी नई टीम की घोषणा की और वरुण गांधी को पार्टी महासचिव पद से हटा दिया. आज की तारीख़ में वरुण गांधी 37 साल के हैं लेकिन पार्टी में उनकी हैसियत गुमनाम सी हो गई है.

साल भर पहले व घर से निकलने के 36 साल बाद नेहरू गांधी परिवार की छोटी बहू मेनका गांधी ने पहली बार अपनी जेठानी सोनिया गांधी की सार्वजनिक तारीफ की थी. पीलीभीत में जिला अनुश्रवण समिति की बैठक में मेनका गांधी ने बीएसए अधिकारी को सोनिया गांधी की मिसाल दी थी. दरअसल हुआ ये कि केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी को लगातार शिकायतें मिल रही थी कि बीएसए दफ्तर में रिश्वतखोरी चरम सीमा पर है. इस पर जब बीएसए ने अपना जवाब दिया तो मेनका गांधी ने अपनी जेठानी सोनिया गांधी की मिसाल देते हुए बीएसए से कहा कि ‘आप सारे क्लर्क को हटा दीजिये.’ इस पर बीएसए बोले कि उनको हटाने का अधिकार एडी बेसिक बरेली को है.

इस पर मेनका गांधी ने सोनिया गांधी की एक कहानी सुनाई और बताया, ‘एक बार सोनिया गांधी के एक रिश्तेदार ने एक दुकान शुरू की. उस दुकान में लिखा कि मैं सोनियां गाधी का रिश्तेदार हूं आप यहां आइए.’ इस पर सोनिया गांधी ने अखबार में इश्तेहार निकाला कि ‘आप लोग अपने काम के लिए किसी और जगह जाइए उस दुकान पर मत जाइए.’ इस मिसाल को पेश करने के बाद मेनका ने अधिकारियों से कहा, ‘मैं भी आप लोगों से यही चाहतीं हूं! कि आप लोग भी इश्तेहार निकालिए, दफ्तर में सीसीटीवी कैमरे लगवाइये. आप मान्यता देने का एक भी रुपया ना लें और बाबुओं पर विजिलेंस की जांच हम करवाएंगे!